Sunday, November 13, 2011

यथा राजा तथा परजा

- आशा पांडेय ओझा

चोर चोर मौसेरे भाई, मिलकर सब खिचडी पका रहे हैं,
लुटिया लगे डूबाने देश की, खुद के यशोगान गा रहे हैं |

आँख के अंधे, अक्ल के दुश्मन, देश के घोड़े दौड़ा रहे हैं,
हंस लगे हैं सब दाना चुगने, अब कौवे मोती खा रहे हैं |

आँख मूँद कर कहती है जनता, कोऊ नृप हो, हमें क्या हानी,
जब चिड़िया चुग जाएगी खेत को, तब ही याद आएगी नानी |

आँखों पर तो पड़ी है पट्टी, तेल कानों में भी डाल रहे हैं,
आँख के अंधे हम सब लोग, आस्तीन में सांप पाल रहे हैं |

कुछ मार कर चांदी की जूती, अपना काम निकाल रहे हैं,
कुछ की खुशमद से आमद, कुछ आठ-२ आंसू निकाल रहे हैं |

समझ पर रख कर पत्थर, लम्बी तान सो रहा प्रजातंत्र है,
सुरसा के मुहं की भांति, दिन ब दिन बढ़ रहा भ्रष्टतंत्र है |

आगे नाथ न पीछे पगहा, अंधेर नगरी चोपट राजा,
करते सब अपना उल्लू सीधा, यथा राजा तथा परजा |

2 comments:

  1. thnx lot Kawaldeep Singh ji 4 sharing this poem

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  2. i shar this poem in fecebool?

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