- आशा पांडेय ओझा
चोर चोर मौसेरे भाई, मिलकर सब खिचडी पका रहे हैं,
लुटिया लगे डूबाने देश की, खुद के यशोगान गा रहे हैं |
आँख के अंधे, अक्ल के दुश्मन, देश के घोड़े दौड़ा रहे हैं,
हंस लगे हैं सब दाना चुगने, अब कौवे मोती खा रहे हैं |
आँख मूँद कर कहती है जनता, कोऊ नृप हो, हमें क्या हानी,
जब चिड़िया चुग जाएगी खेत को, तब ही याद आएगी नानी |
आँखों पर तो पड़ी है पट्टी, तेल कानों में भी डाल रहे हैं,
आँख के अंधे हम सब लोग, आस्तीन में सांप पाल रहे हैं |
कुछ मार कर चांदी की जूती, अपना काम निकाल रहे हैं,
कुछ की खुशमद से आमद, कुछ आठ-२ आंसू निकाल रहे हैं |
समझ पर रख कर पत्थर, लम्बी तान सो रहा प्रजातंत्र है,
सुरसा के मुहं की भांति, दिन ब दिन बढ़ रहा भ्रष्टतंत्र है |
आगे नाथ न पीछे पगहा, अंधेर नगरी चोपट राजा,
करते सब अपना उल्लू सीधा, यथा राजा तथा परजा |
thnx lot Kawaldeep Singh ji 4 sharing this poem
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