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Thursday, January 5, 2012

धन गुरु गोबिंद सिंघ

- राजीव जयसवाल (संपादक द्वारा संपादन सहित)

धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ
मां गुज़री के लाल
गुरु गोबिंद सिंघ
दुष्ट कर्म के काल
गुरु गोबिंद सिंघ
ख़ालसा के सृष्टा
गुरु गोबिंद सिंघ
नवयुग के दृष्टा
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

वारे चारों लाल
गुरु गोबिंद सिंघ
हर हाल खुशहाल
गुरु गोबिंद सिंघ
धर्म के रक्षक
गुरु गोबिंद सिंघ
पाप के भक्षक
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

तुम पे हम को नाज़
गुरु गोबिंद सिंघ
धर्म के सरताज
गुरु गोबिंद सिंघ
गृहस्थ में योगी
गुरु गोबिंद सिंघ
लेखनी के धनी
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

युग प्रवर्तक संत
गुरु गोबिंद सिंघ
पूर्ण किया गुरु ग्रंथ
गुरु गोबिंद सिंघ
हे पिता दश्मेश
गुरु गोबिंद सिंघ
संत सिपाही वेश
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

Tuesday, December 27, 2011

अपना एक मुकाम बनायेंगे

- ज्योति डांग

बोलता हर कोई
क्या मुझे मिला
देश ने क्या दिया
नेताओं ने देश का
बेडा गर्क किया
सोचा कभी हमने
क्या देश के लिए
किया
क्या कुछ भी दे पाये
देश को ?
खोये रहे खुद को
पाने के लिए
खुद की पहचान
बनाने के लिए
कोई ऐसा काम
किया
क्या शहीदों को कभी
याद किया ?
क्या कभी खुद से आँख
मिला पाओगे ?
क्या देश को क्या सम्मान
दिला पाओगे ?
लड़ते रहते हैं
अपने स्वार्थ खातिर
देश को बाँटने खातिर
क्यों ?
आओ मिल कर
एक कसम खायें
गरीबी ,भुखमरी
भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी
से देश को मुक्त करायेंगे
अपना एक मुकाम
बनायेंगे |

मेरा मेरा

- बिक्रमजीत सिंघ जीत

मेरा मेरा करके बन्दे, तूनें आयू समस्त गुज़ारी
प्रभु भक्ति व् जन की सेवा, कदापि न ह्रदय धारी

उलझा माया जाल में इतना, मूल गया तू भूल
भुला के सच्चे साईं को, रहा मोह ममता में झूल

संयोगवश हैं पाये तूनें, यह बहन भाई सन्बन्धी
साथ तेरा न देगा कोई, टूटी जब श्वासों की सँधी

टूटे किसी घड़े से जैसे, रहे रिसता टिप टिप पाणी
वैसे ही श्वासों की पूँजी, जाये घटती हर पल प्राणी

व्यर्थ गवा न समय "जीत"तूँ, सत्य मार्ग अपनाले
श्वास आगामी आये न आये, महिमां प्रभु की गा ले

हो सुचेत कर आत्ममंथन, दिव्य ज्योत तू पाएगा
सफ़ल व् खुश्मय जीवन होगा, अंत पर्मपद पाएगा

सुख क्या, दुख क्या

- राजीव जायसवाल

सुख क्या है
दुख क्या है
मन की अवस्था है
सुख सोचा तो
सुख है
दुख सोचा तो
दुख है |

कभी हंसता है
कभी रोता है
खुशी से नाचता
ना फूला समाता है
नगाड़े ढोल बजवा कर
बड़े उत्सव मनाता है
सजी घोड़ी पे चढ़ता है
दुल्हनिया घर को लाता है |

कभी छाती उदासी है
घटा भी गम की छाती है
कभी दौलत निकलती है
कभी शोहरत फिसलती है
कभी इज़्ज़त नहीं रहती
तबाही साथ चलती है |
ना साथी साथ देते हैं
सभी बच कर निकलते हैं |
 
बहाने लाख होते हैं
कभी हँसने के, रोने के
समंदर आँसुओं से भर
खुदी को खुद डुबाने के |
 
जो सुख हो तो
ना पागल हो
जो दुख हो तो
दुखी ना हो
समन्व्य सुख से ,दुख से कर
रजा में उस की राज़ी हो
प्रभु की बंदगी को कर
ना सुख होगा, ना दुख होगा
ख़त्म सारा भ्रम होगा |
ख़त्म सारा भ्रम होगा |

मनुष्य तो अस्तित्व की पहचान है

- अरविंद योगी
अस्तित्व के आकाश में ,मनुष्य बादल की एक छाया
जी भर बरसा चला गया, जाने फिर वो कहाँ गया ?
सपनो के फसल उगाया, कर्म वृक्ष से फल को खाया
अस्तित्व में खुद को पाया, अस्तित्व को मनुष्य बनाया
परिवर्तन का एहसास कराया,अस्तित्व की पहचान बताया
अस्तित्व-मनुष्य में पावन रिश्ता है,मनुष्य अस्तित्व का फरिस्ता है!
अस्तित्व के सागर में जीवन के गागर से,
एक उफनाती नदी सा खोकर मनुष्य प्यार से,
एहसासों की गहराई में मनुष्य बन उतरता है,
मुस्कराता हुआ लहर बन फिर चमकता है ,
हँसता है,हँसता है, कभी रोता है, रुलाता है ,
अस्तित्व में मनुष्य है, मनुष्य में अस्तित्व है,
अनंत अस्तित्व की अनुपम कृति है मनुष्य ,
अस्तित्व चित्रकार है ,मनुष्य उसका चरित्र है,
अस्तित्व की रचना में, मनुष्य सर्वोत्तम चित्र है ,
सारे रंग भरे हैं मनुष्य में, अनंत अस्तित्व के!
मनुष्य अस्तित्व के आकाश में उन्मुक्त उडान भरने लगा
मनुष्य बदलने लगा,अस्तित्व से भटकने लगा,
संधि कम विग्रह अधिक अब ,मनुष्य में अस्तित्व से ,
मनुष्य और अस्तित्व का अटूट सम्बन्ध ,
आज फिर मनुष्य को समझाना होगा ,
अस्तित्व बन किसी मनुष्य को आना होगा ,
अस्तित्व ईश्वर है , मनुष्य जिसकी संतान है ,
मनुष्य में खुदा है , मनुष्य में भगवान है ,
अस्तित्व से ही मनुष्य बना महान है ,
*योगी* मनुष्य तो अस्तित्व की पहचान है !
यह कविता क्यों ? मनुष्य और अस्तित्व का अन्तः सम्बन्ध जितना ही सरल है उतना ही जटिल और रहस्यमय भी है बशर्ते मनुष्य खुद को पहचाने क्योंकि सम्पूर्ण श्रृष्टि के अस्तित्व में मनुष्य सर्वोत्तम सजीव कृति है! मनुष्य में ही अस्तित्व का रूप सत्यम है,शिवम् है, सुन्दरम है !

Thursday, November 17, 2011

साये की तलाश

- डा. रंजू सिंघ

एक पेड़ का घना साया कभी
मिल न सका मुझे,
ज़िन्दगी की धूप में कुछ यूं
झुलसा ये तन-बदन,
धूप जो चमकती रही,
और मैं झुलसती रही,
ज़िन्दगी अपनी ही
रफ़्तार से चलती रही;
कभी कभी बादल भी
यूं तो जिंदगी में छाया,
कभी घना कोहरा सा
ढकने मुझ को आया,
पर एक परछाई भी
मिल न सकी मुझे,
वक़्त गुज़रता रहा,
मैं भी चलती गई;
कभी थम सी गई,
कभी सिमट भी गई,
कभी कुमला भी गई,
कभी घबरा सी गई,
पर फिर भी भूल से ही,
एक पेड़ का घना साया कभी
मिल न सका मुझे ..

Sunday, November 13, 2011

ऐसे मत जी

- राजीव जयस्वाल

ऐसे
मत जी
विष घूँट
मत पी |
अमृत सागर
अंतर तेरे
मंथन कर
भले का
बुरे का
चिंतन कर |
 
ऐसा कर
हलाहल
अमृत में बदल
पाप वो
मन को जो
दूषित करे
पुण्य वो
मन को जो
सुशोभित करे |
 
हर पल
सोता क्यों
हर पल
रोता क्यों
अब जाग
जो सोया
सो गए
उस के भाग |
 
आराम
मत कर
कर्म कर
कर्म को
निज धर्म कर
उठ जा
आकाश को
छू ले
सूरज सजा
मस्तक पर
तारों की
माला पिरो ले |
 
कर प्रहार
मुष्ट मार
पर्वत को तोड़
नदिया को मोड़
आकाश के
सीने को छेद
पाताल से
पानी निकाल |
 
ना पाप कर
स्वयं पर
विश्वास कर
उठ , हो खड़ा
प्रहार कर
पाप, अत्याचार पर
ना रुक
ना झुक
ना मर
ना डर
जो करना है
वो कर
इतिहास में
हो जा अमर |

मै आदमी हूँ

- अरविंद योगी

मेरे हाँथ में तलवार है
काट  दूंगा जीभ तुम्हारी
भूल से भी मुझे तुम
आदमी मत कहना
अब मै आदमी नहीं हूँ !
 
मर चुका है आदमी शब्द
मर चुका है जीवन
कभी मै आदमी था
ह्रदय से उदार था
कर्म से महान था
धरा पर बना कभी
भक्ति से भगवान था
ज्ञान का प्रकाश था
आदमी में भगवान की
स्नेहिल छाया का एहसास था
आदमी तब आदमी के साथ था
जीवन से बहुत पास था
आदमी धरा पर भगवान था
आदमी मत कहना
अब मै आदमी नहीं हूँ !
 
हाँ मै आदमी था और आज भी
आदमी की तलाश में हूँ
खोजता हूँ अपने ह्रदय में
खोये आदमी को हर आदमी को
आज समाज  स्वार्थ में खो रहा है
स्वार्थ में जी रहा है आदमी
जीना दूसरों के लिए मरना
आदमी की पहचान है
आदमी मत कहना
अब मै आदमी नहीं हूँ !

यथा राजा तथा परजा

- आशा पांडेय ओझा

चोर चोर मौसेरे भाई, मिलकर सब खिचडी पका रहे हैं,
लुटिया लगे डूबाने देश की, खुद के यशोगान गा रहे हैं |

आँख के अंधे, अक्ल के दुश्मन, देश के घोड़े दौड़ा रहे हैं,
हंस लगे हैं सब दाना चुगने, अब कौवे मोती खा रहे हैं |

आँख मूँद कर कहती है जनता, कोऊ नृप हो, हमें क्या हानी,
जब चिड़िया चुग जाएगी खेत को, तब ही याद आएगी नानी |

आँखों पर तो पड़ी है पट्टी, तेल कानों में भी डाल रहे हैं,
आँख के अंधे हम सब लोग, आस्तीन में सांप पाल रहे हैं |

कुछ मार कर चांदी की जूती, अपना काम निकाल रहे हैं,
कुछ की खुशमद से आमद, कुछ आठ-२ आंसू निकाल रहे हैं |

समझ पर रख कर पत्थर, लम्बी तान सो रहा प्रजातंत्र है,
सुरसा के मुहं की भांति, दिन ब दिन बढ़ रहा भ्रष्टतंत्र है |

आगे नाथ न पीछे पगहा, अंधेर नगरी चोपट राजा,
करते सब अपना उल्लू सीधा, यथा राजा तथा परजा |

Monday, November 7, 2011

आखिर क्यूँ? (Edited by Editor)

- डा. रंजू सिंह

हम न गुज़रें,
तेरी गली के
पास से भी कभी,
चले आते हो
तुम फिर भी
मेरी ओर
आखिर क्यूँ?

हम न लायें
ज़िक्र भी तेरा
जुबां पर अपनी
तुम आ जाते हो
फिर भी
मेरी हर गुफ्तगू में क्यूँ?

राहें जुदा,
घर हैं जुदा,
जुदा तो ख्यालात भी,
मिल जाता है
तेरा का हर छोर
मेरी ही गली से
फिर क्यूँ?

कर लिया है
यूं तो मैंने इलाज
दर्द-ए-दिल का,
याद आ जाते हो
किसी तरह
मुझे हर सुबह-ओ-शाम
तुम फिर क्यूँ?

प्यार नहीं,
आरज़ू नहीं
दिलकशी नहीं
तन्हाई भी नहीं,
महक सी आती है
मुझे फिर भी
तेरे गीतों से
आखिर क्यूँ?

टूट चूका दिल,
टूट चूका रिश्ता,
टूट गए ख्वाब,
खो गए तुम,
खो गयी मैं,
फिर भी याद तेरी
आती है
नजाने पल-पल क्यूँ?

Saturday, November 5, 2011

कागज़ की कश्तियाँ

- ज्योति डांग

कागज़ की कश्तियो पे सबकी निगाह होती है |
खुद नदी ही कभी इन की कत्लगाह होती है |

रंग हर रोज़ ही दिखता है सिआसत का नया,
सुर्ख होती है कभी और कभी ये स्याह होती है |

पूछलो गैर से भी हाले दिल ज़रा इक दिन,
जिस्त उस की भी तो अपनी ही तराह होती है |

आ के मंजिल पे ख़तम होती है भटकन सारी,
साथ अपनों का मिले बस ये ही चाह होती है |

हाँ अदावत तो गुनाह है ये हकीकत है मगर,
अब तो उल्फत भी मेरे दोस्त गुनाह होती है |

क्या गिला राह्जनों से करें हम "ज्योति",
कभी रहबरी राहजनी से भी स्याह होती है |

कैसे कहूं दीवाली है

- अरविन्द योगी

आज की रात ये रौशन है
कल फिर सुबह काली है
झूठी होती इस दुनिया में
सच का दिया जो खाली है
कैसे कहूं दीवाली है !

टूटी अब हर रिश्तों की डाली है
रिश्ता भी अब एक गाली है
प्यार की बगिया जो खाली है
रोया हर एक माली है
कैसे कहूं दीवाली है !

तिनका तिनका बिखरा भारत अब
घुट घुट कर रोती भारत माता अब
देशप्रेम का उपवन अब ये खाली है
जिसकी भारत माँ ही माली है
कैसे कहूं दीवाली है !

भ्रष्टाचार की गहरी रात ये काली है
नेता करते देश की बिकवाली है
फैला हर ओर धोखा है दलाली है
बेचारी जनता, नेता अत्याचारी है
कैसे कहूं दीवाली है !

देश भक्ति का दिया जो खाली है
देश प्रेम की गर्म रक्त से
सुलग रहे हर देश भक्त से
नयी क्रांति आने वाली है
कैसे कहूं दीवाली है !

जलो तुम स्वरक्त से दिया भर
भारत माँ तुम्हे जगाने वाली हैं
भारत की जगमग ज्योति से
दुनिया हुयी उजाली है
दूर नहीं अब नव भारत की
कुछ ही दूर दीवाली है
पर कैसे कहूं दीवाली है !

यह कविता क्यों ? आतंकवाद , भ्रस्ताचार , बलात्कार , अत्याचार जाने कितने ही दिए जल रहे हैं भारत में अब और इनमे तेल बन कर जल रहा है भारत का हर आदमी !

हर ह्रदय दुखी है एक क्रांति चाहिए भारत को! नव भारत की दीवाली अभी दूर है उठिए जागिये और नव भारत की दीवाली लाने को क़मर कस लीजिये फिर मनाये हर रोज होली है दीवाली है !

Sunday, October 30, 2011

हास्य-व्यंग्य - वन्दे श्वान भारतम

- पंडित सुरेश नीरव

मानव समाज में कुत्तों की हमेशा से पूछ रही है। ऐसा माना जाता है कि उसकी इस पूछ में सारा योगदान खुद उसकी पूंछ का ही रहा है। उसकी हिलती पूंछ देखकर बेचारे आदमी का भी मन पूंछ हिलाने को ललचा-ललचा जाता है। भले ही ईश्वर ने उसे कुत्ते की तरह पूंछ नहीं दी फिर भी वह अफसर के आगे पूंछ हिलाने का कठिन कारनामा कुत्तों की प्रेरणा लेकर कर ही डालता है। पूंछ हिलाने की कुत्तों की इस प्राचीन लोककला का मानव हमेशा से ही मुरीद रहा है। इसीलिए तो सतयुग से लेकर आज के लेटेस्ट कलियुग तक कुत्तों के रुतबे में एक मिलीमीटर की भी कमी नहीं आई है। जिन वेदों में द्विवेदी या त्रिवेदी की तो बात छोड़िए एक अदद किसी चतुर्वेदी को भी जगह नहीं मिल पाई उन पवित्र वेदों में एक नहीं बल्कि श्याम और शबिल नामक दो कुत्तों ने अपनी हाजरी दर्ज़ कराके साबित कर दिया कि कुत्तों के आगे आदमी की कोई हैसियत नहीं। आदमी से कुत्ता हमेशा ज्यादा प्रतिष्ठित रहा है। शायद इसलिए कि कुत्ता कभी चरित्रहीन नहीं होता है। और न केवल वो आदमी को अपराधी के घर तक पहुंचाता है बल्कि सोए हुए काल देवता मिस्टर यमराज को भी सिंसियरली जगाता है। अपराधी तक कुत्तों के पहुंचने की मौलिक प्रतिभा के आगे तब बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो जाता है जब खुद अपराधी कुत्ते पाल लेते हैं और कुत्तों से सावधान की तख्ती अपने दरवाजे पर टांग देते हैं। सावधान तो आदमी को अपराधी से रहना चाहिए शरीफ कुत्तों से सावधान होने की क्या जरूरत होती है। हो सकता है यह बोर्ड मकान मालिक अपने चोर भाइयों को सावधान करने के लिए लगाते हों क्योंकि ऐसी मान्यता है कि कुत्ते चोरों पर ही भूंकते हैं। आखिक कुत्तों की भी तो कोई हैसियत होती है। गरज हो तो वे कुत्तों का मुंह चाटें। बहुत कम लोग जानते हैं कि श्रीराम के यंगर ब्रदर भरत कुत्तों के बड़े शौकीन थे। रामचंद्रजी कुत्तों- के शौकीन नहीं थे। कुत्तों की दुआओं से ही भरत अयोध्या के राजा बने और कुत्तों से बेरुखी के कारण ही राम को वनवास भोगना पड़ा। भगवान भैरों और दत्तात्रेय का श्वान प्रेम इंटरनेशनली जगजाहिर है। यह कुत्ते की ही दमखम थी कि वो अपने अकेले के इवविटेशन पर मालिक धर्मराज युधिष्ठिर को विद फेमली सशरीर स्वर्ग ले गया। अगर आदमी की इतनी औकात होती तो स्वर्ग से लात खाकर उसे त्रिशंकु नहीं बनना पड़ता। कलियुग में चंद्रमा से मामा के तमाम रिश्ते बनाकर भी आदमी चांद पर श्वानसुंदरी लायका से पहले नहीं जा पाया। गोरे-काले के मुद्दों पर जानवरों की तरह लड़ते हुए आदमी को कुत्तों से ट्यूशन पढ़कर नस्ली सदभाव का पाठ सीखना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुत्तों का कुकरमूल संस्कार है। एक बार एक सिरफिरे एकलव्य ने तीर से एक श्वान का मुंह बंद कर अभिव्यक्ति पर सेंसरशिप लगाने की जघन्य हरकत की थी। इस उद्दंडता के दंडस्वरूप ही द्रोणाचार्य ने उसका अंगूठा कटवाकर कुत्तों के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया था। खुशी की बात है कि आजादी के बाद हमारे देश में कुत्तों- की इज्जत में माइंडब्लोइंग इजाफा हुआ है। कुत्तों के इस जलवो जलाल से कुंठित होकर राष्ट्रपशु शेरों और बाघों ने आत्म हत्याएं करली हैं और बचे-खुचों की सुपारी उठवाकर गीदड़ो ने हत्याएं करवा दी हैं। ताज्जुब नहीं कि संख्याबल के आधार पर कल कुत्तों को भारत देश का राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाए। हमें खुशी है कि भले ही हमारा न हो मगर अपने देश में कुत्तों का और इन त्रैलोकमान्य मान्यवर कुत्तों के कारण इस देश का भविष्य भरपूर उज्ज्वल है। कुत्ता होना ही बड़ी बात है अब इंडिया में। वंदे श्वान भारतम..।

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं ना रह जाये" !

- देश दीपक मिश्रा

कसम "जगमगाते" चेहरों की भाई साब ! क्या "धमाकेदार" "वर्चुअल" दिवाली है इस बार ! जिसे देखो वही "इको फ्रेंडली" "धमाके" कर रहा है ! वो कहते है ना कि "कोई अंत नहीं है,.मुहब्बत के फ़साने का, सुनाता ही चला जा रहा है,जिसे जो "याद" आ रहा है" ! पटाखे,अनार,चरखी,फुलझड़ी "सब कुछ" तो है यहाँ पर...कोई "रामलीला मैदान" में जमा "चंदे" का "हिसाब" मांग रहा है तो कोई "कश्मीर" पर "बयान" दे रहा है ! वाह रे "मैग्सेसे" फूट डालने से पहले ही "करोड़ों" बच गए ! "अपनी-अपनी" "ढपली" पीटने कि "कोशिश" में "पानी" और "सपरेटा" अलग हो गए ! पुरानी कहावत है "कामयाबी" पा लेना "आसान" है मगर "पचाना" मुश्किल है ! "लक्ष्मीजी" की "सवारी" को "थ्री डी" "चश्मा" पहना देने से भी उसे "दिन" में "दिखाई" नहीं देगा ! कांग्रेस "हिसार" से नहीं "अमेठी" से जीतती है ! ये अलग बात है की "जनसेवा" के लिए "दोहरा" किराया वसूलना "जन-लोकपाल" के दायरे में नहीं आता है ! वैसे भी "नौ" दिन में "नौ" लाख चुकाना "आम आदमी" के "बस" की "बात" भी नहीं है ! वो जानता है की "लक्ष्मी पूजन" वो चाहे "नोयडा-पार्क" में करे या "तिहाड़-जेल" में, उसे तो "रालेगन-सिध्ही" के "प्रधान" की तरह "बैरंग" ही वापस आना है और "अगले" के "पैर" में "चप्पल" भी नहीं है जो "फेंक" कर "विरोध" तो जता ले ! वो तो "बेचारा" इसी में "खुश" है कि बड़े-बड़े "ग्लैमरस" चेहरे रोज़ उससे "वोटर" बनने कि "अपील" कर रहे है ! "मल्टी-नेशनल" कम्पनियां उसीके लिए "टी.वी." "फ्रिज" "एल.सी.डी." "कार" "मोबाईल" पर विशेष "ऑफर" दे रहे है ! वो रात नौ बजे "मास्टर शेफ" के बनते "लज़ीज़ व्यंजन" को "देख-देख" कर "मुग्ध" है और हाँ इस बार दिवाली पर "आम आदमी" खाली हाथ नहीं है...अग्निवेश,रामदेव,दिग्विजय,किरण,प्रशांत,केजरीवाल,शरद पवार,प्रणव......एक से बढ़कर एक "पटाखे" है,बीच-बीच में अडवाणी "फुलझड़ी" भी है ..मै भी पी.एम्....अब आप प्लीज़ त्योहारों के इस "सेलिब्रेशन" में "मनहूस" टाइप कि "पंक्तियाँ" ना सुनाने लगिएगा कि ..."सृजन है अधुरा,अगर विश्व में किसी भी द्वार पर है उदासी ! मनुजता नहीं पूर्ण तब तक,जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी !चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,भले ही दिवाली यहाँ रोज़ आये, जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं ना रह जाये" !!!! भूख,अभाव,गरीबी,लाचारी,महंगाई,आम आदमी,बेबसी..... "फारगेट इट"..."इफ यू कैन"....शुभ दीपावली !!!!!!!!!

Saturday, October 29, 2011

तुम कहाँ हो ?

- आशा पांडेय ओझा

तुम कहाँ हो ?
किरणों में रस घोलती तरंगो में
असंख्य तारों के विविध रंगों में
झुरमुट में अटके चाँद को निहारती
गीत भरे आंसू से प्रिय चरण पखारती
कहाँ ढूँढूं तुम कहाँ हो ?
 
हवा की लजीली खुनकियों में
किसी विरहनी की हिचकियों में
किसी बटोही की लोटती राह में
या उसकी राह ताकती निगाह में
ठहरी तुम कहाँ हो ?
 
कलेजे में इतनी ममता लेकर
इतनी संयुक्त क्षमता लेकर
कलियों सी कोमलता लेकर
अमृत घटों की मधुरता लेकर
रस सी घुलती तुम कहाँ हो?
 
पर कटे व्याकुल पांखी सी
झर-झर आंसू झरती आंखी सी
रात भर करवटों में जगी थकी रात सी
सूरज मिलन के प्रतीक्षा में बैठे प्रभात सी
छटपटाती तुम कहाँ हो ?
 
धुआं- धुआं सी क्यों उडती हो
मुझसे बिछड़ कर किससें जुड़ती हो
किस सीप का मोती बनने की चाह है तेरी
किन नयनों की ज्योति बनने की चाह है तेरी
वो कहाँ है और तुम कहाँ हो ?
 
किसको जितना चाहती हो खुद को हार के
किसके लिए पिरो रही फूल मनुहार के
खुद डूबना चाहती हो किसको तार के
किसके लिए सजे बोल अधरों पर प्यार के
बाट किसी की जोहती तुम कहाँ हो ?
 
किसके लिए है ये हिये की हलचल
किसके रूप पे हो गई इतनी पागल
ऐ-चातकी बता न कौन है तेरा बादल
कौन लायेगा तेरे लिए सतरंगी आँचल
ढूंढ़ती उसको तुम कहाँ हो?
 
मधुमय तेरे जीवन का कौन है मधु
ये बावली लहर बता कौन है तेरा सिन्धु
तुम किसकी हो यामिनी ,कौन है तुम्हारा इंदु
है किसके लिए बहकी नज़र अधर मृदु
समर्पित किसको तुम कहाँ हो ?
 
हिम की बाँह से बिछड़ी मंदाकिनी सी
साज के तारों से चटकी रागिनी सी
शशि की गोद से गिरती चाँदनी सी
माल्या से अलग हुई मलायीनी सी
तड़फती सी तुम कहाँ ?
 
जानती हो तेरा मन किसका है
जानती हो तेरा जीवन किसका है
भावों के सुमन संकलित हैं किसके वास्ते
श्रधा के कोमल सुमन मुकुलित हैं किसके वास्ते
न्यौछ्वर किसपे तुम कहाँ हो
 
किसें निरखती हो यूं निर्निमेष
किसको पाने को बदलती हो भेष
तेरे मरू जीवन का कुसुमित तरु है कौन
मन सरोवर की चारू तरंग है कौन
चाह में उसकी तुम कहाँ हो

पुस्तक “दो बूँद समुद्र के नाम” के “तुम कहाँ हो” के कुछ अंश

माया माया मन भरमाया

-राजीव जयस्वाल

माया माया
मन भरमाया
योग , ध्यान
कुछ काम ना आया
जब माया ने
तीर चलाया
माया माया
मन भरमाया |
 
मन को कभी
काम ने घेरा
राम नाम का
रस बिसराया
कोमल बदन
काजर नयन
प्रेम पाश फँस
मिथ्या प्रीत में
जन्म गँवाया
माया माया
मन भरमाया |
 
मन को कभी
रुपईया भाया
सुबह शाम
धन खूब कमाया
धर्म ना जाना
मर्म ना जाना
पैसा पैसा
पास में आया
अंत समय
जब चला बावरा
खाली हाथ
कुछ साथ ना जाया
माया माया
मन भरमाया |

आइनों ने नहीं सीखा..

- महिंदर रिश्म

किरण रौशनी की नज़र नहीं आती कहीं
सूरज हाथ में ले किधर चला गया है कोई
 
जख्म खुले हैं टीस भी बे-तरह सी उठती है
तीखे नश्तर फूलों में क्यों धर गया है कोई
 
सदायें लौटी हैं उस दर से बेआबरू हो कर
शायद परछाइयों ही से डर गया है कोई
 
मुहबत नहीं मोहताज मनसुई हवाओं की
इलज़ाम मौत का दूसरे पे धर गया है कोई
 
आइनों ने नहीं सीखा कुछ भी झूठ कहना
बीनाइओ में ही क्यों उतर गया है कोई

Thursday, October 27, 2011

खाने की कीमत (लघुकथा)

- डा. अनिल यादव
आज डॉ.विवेक के बेटे डॉ.राजीव की शादी का रिसेप्शन है। शहर के लगभग सभी गणमान्य नामों को आमंत्रण है। सभी आयेंगे भी ऐसा ही विश्वास है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि डॉ.विवेक न केवल एक चिकित्सक हैं बल्कि राजनैतिक रसूख भी रखते हैं। उन्हें लोग एक तावदार डॉक्टर के रुप में भी देखते हैं। उनके बेटे ने भी एम.एस. करके पिताजी के साथ नाम करना शुरु कर दिया है। बहू भी डॉक्टर ढूंढी।
पार्टी शबाब पर थी। इसी बीच काउंटर के एक कोने में शोर सुनाई पड़ा। डी.जे. के शोर में भी आवाज साफ सुनाई पड़ रही थी। मारो स्स्साले को... हरामख़ोर है। मैं अपने को रोक नहीं पाया।
घटनास्थल पर पहुँचा तो देखा एक दस-बारह बरस के बच्चे को कई लोग लात-घूँसों से मार रहे थे। मुझे बताया गया कि यह लड़का खाना खा रहा था। डॉक्टर साहब के ठेकेदार साले ने पकड़ लिया। जब उन्होंने पीटना शुरु किया तो उनके साथ और भी हाथ उठ गये।
लड़का काफी रो रहा था। वह बता रहा था कि उसका भाई कॉफी काउंटर पर काम कर रहा है। वह उसी के साथ था। उसे उसके भाई के सामने लाया गया। डॉक्टर साहब के साले गरजे-
'क्यों बे! ये तेरा भाई है।'
'जी साहब'
'तो यह खाना खायेगा।'
'नहीं साहब'
'तेरे को पैसा नहीं मिलेगा क्या? तू इसे क्यों लाया? जानता है एक प्लेट की कीमत क्या है? छः सौ रुपये हैं। साले... अपनी अम्मा... बीबी... भाई-बहन सबको लाके खिला।' इतना कहकर उन्होंने दो झापड़ रसीद किये। 'कुत्तों... सूअर के औलादों... इसी तरह भीख माँगते रह जाओगे।'
कुछ लोगों ने हंगामा देखकर उनको रोकने की कोशिश की परंतु वो कहाँ मानने वाले। नॉन-स्टॉप गाली दिये जा रहे थे।
हंगामे के दौरान उन्होंने देखा विधायक जी आ गये हैं। लड़के को छोड़कर वे विधायक जी की तरफ मुड़ गये। विधायक जी को प्रणाम कर उन्होंने पूछा, 'और लोग कहाँ हैं विधायक जी।'
'गाड़ी में हैं' ,विधायक जी ने कहा।
'अरे सुक्खू! विधायक जी के सभी लोगों को भीतर खाने के लिए बुला ला।' इतना कहकर डॉक्टर साहब के साले ने विधायक जी के लिए प्लेट लगाना शुरु कर दिया। मार खाया बच्चा कॉफी टेबल के पास आँसू बहा रहा था। उसका भाई कॉफी बनाने में जुट गया। कभी वह कॉफी के भाप को देखता तो कभी अपने रोते भाई को। इसी बीच उसके आँख से टपके दो बूँद कॉफी मशीन पर गिरकर फना हो गये।

Tuesday, October 25, 2011

आज

-वीरेन्द्र शर्मा 'योगी'

आँख मेरी नम नहीं है दिल मगर रोया है आज |
ऐसा लगता है के जैसे बहुत कुछ खोया है आज |

कल जो बोया था वो ही तो काटते हो आजकल,
और कल भी काटना है वो ही जो बोया है आज |
 
वो सुलाना चाहता है मुझ को गहरी नींद में,
मैं जगाना चाहता हूँ उस को जो सोया है आज |

जिस का दामन थाम के सीखा था चलना-बोलना,
अपने कांधे पे उसी की लाश को ढोया है आज |

दर्द का एहसास उस को 'योगी' अब होता नहीं,
कल तलक वो जागता था,हाँ मगर सोया है आज |

Monday, October 24, 2011

मैं कौन ?

- शरण कुमार लिंबाले
मूल मराठी से सूर्यनारायण रणसुभे द्वारा अनुवादित

यह तेजस्वी सूर्य किनके लिए ?
यह अनंत आकाश किनके लिए ?
यह विशाल जलाशय किनके लिए ?
यह विस्तृत देश किनके लिए ?
यह संसद, ये संविधान, ये लोग,
यह समाज, यह कानून किनके लिए ?
ये मनुष्य, मनुष्य लगते ही नहीं
खूंख़ार जानवरों के गिरोफ़ हैं ये,
मैं जी नहीं रहा हूँ रे यहां
सिर्फ़ मृत्यु को टाल रहा हूँ
क्षण-क्षण की मौत
पूरी ज़िन्दगी पर टँगी हुई ।
यह ज़िन्दगी भी क्या है ?
धधकती झोपड़ी में
जलते हुए जीने के लिए
मज़बूरी से की गई कोशिश !
मैं कौन ? मैं किनके लिए ?
गूँगी सत्ता, गूँगी जनता, गूँगी संस्कृति
गूँगे वेद, गूँगे शास्त्र, गूँगी मनुस्मृति ।