Showing posts with label काव्य. Show all posts
Showing posts with label काव्य. Show all posts

Thursday, January 5, 2012

धन गुरु गोबिंद सिंघ

- राजीव जयसवाल (संपादक द्वारा संपादन सहित)

धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ
मां गुज़री के लाल
गुरु गोबिंद सिंघ
दुष्ट कर्म के काल
गुरु गोबिंद सिंघ
ख़ालसा के सृष्टा
गुरु गोबिंद सिंघ
नवयुग के दृष्टा
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

वारे चारों लाल
गुरु गोबिंद सिंघ
हर हाल खुशहाल
गुरु गोबिंद सिंघ
धर्म के रक्षक
गुरु गोबिंद सिंघ
पाप के भक्षक
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

तुम पे हम को नाज़
गुरु गोबिंद सिंघ
धर्म के सरताज
गुरु गोबिंद सिंघ
गृहस्थ में योगी
गुरु गोबिंद सिंघ
लेखनी के धनी
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

युग प्रवर्तक संत
गुरु गोबिंद सिंघ
पूर्ण किया गुरु ग्रंथ
गुरु गोबिंद सिंघ
हे पिता दश्मेश
गुरु गोबिंद सिंघ
संत सिपाही वेश
गुरु गोबिंद सिंघ
धन गुरु गोबिंद सिंघ
धन धन गुरु गोबिंद सिंघ |

Tuesday, December 27, 2011

अपना एक मुकाम बनायेंगे

- ज्योति डांग

बोलता हर कोई
क्या मुझे मिला
देश ने क्या दिया
नेताओं ने देश का
बेडा गर्क किया
सोचा कभी हमने
क्या देश के लिए
किया
क्या कुछ भी दे पाये
देश को ?
खोये रहे खुद को
पाने के लिए
खुद की पहचान
बनाने के लिए
कोई ऐसा काम
किया
क्या शहीदों को कभी
याद किया ?
क्या कभी खुद से आँख
मिला पाओगे ?
क्या देश को क्या सम्मान
दिला पाओगे ?
लड़ते रहते हैं
अपने स्वार्थ खातिर
देश को बाँटने खातिर
क्यों ?
आओ मिल कर
एक कसम खायें
गरीबी ,भुखमरी
भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी
से देश को मुक्त करायेंगे
अपना एक मुकाम
बनायेंगे |

मेरा मेरा

- बिक्रमजीत सिंघ जीत

मेरा मेरा करके बन्दे, तूनें आयू समस्त गुज़ारी
प्रभु भक्ति व् जन की सेवा, कदापि न ह्रदय धारी

उलझा माया जाल में इतना, मूल गया तू भूल
भुला के सच्चे साईं को, रहा मोह ममता में झूल

संयोगवश हैं पाये तूनें, यह बहन भाई सन्बन्धी
साथ तेरा न देगा कोई, टूटी जब श्वासों की सँधी

टूटे किसी घड़े से जैसे, रहे रिसता टिप टिप पाणी
वैसे ही श्वासों की पूँजी, जाये घटती हर पल प्राणी

व्यर्थ गवा न समय "जीत"तूँ, सत्य मार्ग अपनाले
श्वास आगामी आये न आये, महिमां प्रभु की गा ले

हो सुचेत कर आत्ममंथन, दिव्य ज्योत तू पाएगा
सफ़ल व् खुश्मय जीवन होगा, अंत पर्मपद पाएगा

सुख क्या, दुख क्या

- राजीव जायसवाल

सुख क्या है
दुख क्या है
मन की अवस्था है
सुख सोचा तो
सुख है
दुख सोचा तो
दुख है |

कभी हंसता है
कभी रोता है
खुशी से नाचता
ना फूला समाता है
नगाड़े ढोल बजवा कर
बड़े उत्सव मनाता है
सजी घोड़ी पे चढ़ता है
दुल्हनिया घर को लाता है |

कभी छाती उदासी है
घटा भी गम की छाती है
कभी दौलत निकलती है
कभी शोहरत फिसलती है
कभी इज़्ज़त नहीं रहती
तबाही साथ चलती है |
ना साथी साथ देते हैं
सभी बच कर निकलते हैं |
 
बहाने लाख होते हैं
कभी हँसने के, रोने के
समंदर आँसुओं से भर
खुदी को खुद डुबाने के |
 
जो सुख हो तो
ना पागल हो
जो दुख हो तो
दुखी ना हो
समन्व्य सुख से ,दुख से कर
रजा में उस की राज़ी हो
प्रभु की बंदगी को कर
ना सुख होगा, ना दुख होगा
ख़त्म सारा भ्रम होगा |
ख़त्म सारा भ्रम होगा |

मनुष्य तो अस्तित्व की पहचान है

- अरविंद योगी
अस्तित्व के आकाश में ,मनुष्य बादल की एक छाया
जी भर बरसा चला गया, जाने फिर वो कहाँ गया ?
सपनो के फसल उगाया, कर्म वृक्ष से फल को खाया
अस्तित्व में खुद को पाया, अस्तित्व को मनुष्य बनाया
परिवर्तन का एहसास कराया,अस्तित्व की पहचान बताया
अस्तित्व-मनुष्य में पावन रिश्ता है,मनुष्य अस्तित्व का फरिस्ता है!
अस्तित्व के सागर में जीवन के गागर से,
एक उफनाती नदी सा खोकर मनुष्य प्यार से,
एहसासों की गहराई में मनुष्य बन उतरता है,
मुस्कराता हुआ लहर बन फिर चमकता है ,
हँसता है,हँसता है, कभी रोता है, रुलाता है ,
अस्तित्व में मनुष्य है, मनुष्य में अस्तित्व है,
अनंत अस्तित्व की अनुपम कृति है मनुष्य ,
अस्तित्व चित्रकार है ,मनुष्य उसका चरित्र है,
अस्तित्व की रचना में, मनुष्य सर्वोत्तम चित्र है ,
सारे रंग भरे हैं मनुष्य में, अनंत अस्तित्व के!
मनुष्य अस्तित्व के आकाश में उन्मुक्त उडान भरने लगा
मनुष्य बदलने लगा,अस्तित्व से भटकने लगा,
संधि कम विग्रह अधिक अब ,मनुष्य में अस्तित्व से ,
मनुष्य और अस्तित्व का अटूट सम्बन्ध ,
आज फिर मनुष्य को समझाना होगा ,
अस्तित्व बन किसी मनुष्य को आना होगा ,
अस्तित्व ईश्वर है , मनुष्य जिसकी संतान है ,
मनुष्य में खुदा है , मनुष्य में भगवान है ,
अस्तित्व से ही मनुष्य बना महान है ,
*योगी* मनुष्य तो अस्तित्व की पहचान है !
यह कविता क्यों ? मनुष्य और अस्तित्व का अन्तः सम्बन्ध जितना ही सरल है उतना ही जटिल और रहस्यमय भी है बशर्ते मनुष्य खुद को पहचाने क्योंकि सम्पूर्ण श्रृष्टि के अस्तित्व में मनुष्य सर्वोत्तम सजीव कृति है! मनुष्य में ही अस्तित्व का रूप सत्यम है,शिवम् है, सुन्दरम है !

Thursday, November 17, 2011

साये की तलाश

- डा. रंजू सिंघ

एक पेड़ का घना साया कभी
मिल न सका मुझे,
ज़िन्दगी की धूप में कुछ यूं
झुलसा ये तन-बदन,
धूप जो चमकती रही,
और मैं झुलसती रही,
ज़िन्दगी अपनी ही
रफ़्तार से चलती रही;
कभी कभी बादल भी
यूं तो जिंदगी में छाया,
कभी घना कोहरा सा
ढकने मुझ को आया,
पर एक परछाई भी
मिल न सकी मुझे,
वक़्त गुज़रता रहा,
मैं भी चलती गई;
कभी थम सी गई,
कभी सिमट भी गई,
कभी कुमला भी गई,
कभी घबरा सी गई,
पर फिर भी भूल से ही,
एक पेड़ का घना साया कभी
मिल न सका मुझे ..

Sunday, November 13, 2011

ऐसे मत जी

- राजीव जयस्वाल

ऐसे
मत जी
विष घूँट
मत पी |
अमृत सागर
अंतर तेरे
मंथन कर
भले का
बुरे का
चिंतन कर |
 
ऐसा कर
हलाहल
अमृत में बदल
पाप वो
मन को जो
दूषित करे
पुण्य वो
मन को जो
सुशोभित करे |
 
हर पल
सोता क्यों
हर पल
रोता क्यों
अब जाग
जो सोया
सो गए
उस के भाग |
 
आराम
मत कर
कर्म कर
कर्म को
निज धर्म कर
उठ जा
आकाश को
छू ले
सूरज सजा
मस्तक पर
तारों की
माला पिरो ले |
 
कर प्रहार
मुष्ट मार
पर्वत को तोड़
नदिया को मोड़
आकाश के
सीने को छेद
पाताल से
पानी निकाल |
 
ना पाप कर
स्वयं पर
विश्वास कर
उठ , हो खड़ा
प्रहार कर
पाप, अत्याचार पर
ना रुक
ना झुक
ना मर
ना डर
जो करना है
वो कर
इतिहास में
हो जा अमर |

मै आदमी हूँ

- अरविंद योगी

मेरे हाँथ में तलवार है
काट  दूंगा जीभ तुम्हारी
भूल से भी मुझे तुम
आदमी मत कहना
अब मै आदमी नहीं हूँ !
 
मर चुका है आदमी शब्द
मर चुका है जीवन
कभी मै आदमी था
ह्रदय से उदार था
कर्म से महान था
धरा पर बना कभी
भक्ति से भगवान था
ज्ञान का प्रकाश था
आदमी में भगवान की
स्नेहिल छाया का एहसास था
आदमी तब आदमी के साथ था
जीवन से बहुत पास था
आदमी धरा पर भगवान था
आदमी मत कहना
अब मै आदमी नहीं हूँ !
 
हाँ मै आदमी था और आज भी
आदमी की तलाश में हूँ
खोजता हूँ अपने ह्रदय में
खोये आदमी को हर आदमी को
आज समाज  स्वार्थ में खो रहा है
स्वार्थ में जी रहा है आदमी
जीना दूसरों के लिए मरना
आदमी की पहचान है
आदमी मत कहना
अब मै आदमी नहीं हूँ !

यथा राजा तथा परजा

- आशा पांडेय ओझा

चोर चोर मौसेरे भाई, मिलकर सब खिचडी पका रहे हैं,
लुटिया लगे डूबाने देश की, खुद के यशोगान गा रहे हैं |

आँख के अंधे, अक्ल के दुश्मन, देश के घोड़े दौड़ा रहे हैं,
हंस लगे हैं सब दाना चुगने, अब कौवे मोती खा रहे हैं |

आँख मूँद कर कहती है जनता, कोऊ नृप हो, हमें क्या हानी,
जब चिड़िया चुग जाएगी खेत को, तब ही याद आएगी नानी |

आँखों पर तो पड़ी है पट्टी, तेल कानों में भी डाल रहे हैं,
आँख के अंधे हम सब लोग, आस्तीन में सांप पाल रहे हैं |

कुछ मार कर चांदी की जूती, अपना काम निकाल रहे हैं,
कुछ की खुशमद से आमद, कुछ आठ-२ आंसू निकाल रहे हैं |

समझ पर रख कर पत्थर, लम्बी तान सो रहा प्रजातंत्र है,
सुरसा के मुहं की भांति, दिन ब दिन बढ़ रहा भ्रष्टतंत्र है |

आगे नाथ न पीछे पगहा, अंधेर नगरी चोपट राजा,
करते सब अपना उल्लू सीधा, यथा राजा तथा परजा |

Monday, November 7, 2011

आखिर क्यूँ? (Edited by Editor)

- डा. रंजू सिंह

हम न गुज़रें,
तेरी गली के
पास से भी कभी,
चले आते हो
तुम फिर भी
मेरी ओर
आखिर क्यूँ?

हम न लायें
ज़िक्र भी तेरा
जुबां पर अपनी
तुम आ जाते हो
फिर भी
मेरी हर गुफ्तगू में क्यूँ?

राहें जुदा,
घर हैं जुदा,
जुदा तो ख्यालात भी,
मिल जाता है
तेरा का हर छोर
मेरी ही गली से
फिर क्यूँ?

कर लिया है
यूं तो मैंने इलाज
दर्द-ए-दिल का,
याद आ जाते हो
किसी तरह
मुझे हर सुबह-ओ-शाम
तुम फिर क्यूँ?

प्यार नहीं,
आरज़ू नहीं
दिलकशी नहीं
तन्हाई भी नहीं,
महक सी आती है
मुझे फिर भी
तेरे गीतों से
आखिर क्यूँ?

टूट चूका दिल,
टूट चूका रिश्ता,
टूट गए ख्वाब,
खो गए तुम,
खो गयी मैं,
फिर भी याद तेरी
आती है
नजाने पल-पल क्यूँ?

Saturday, November 5, 2011

कैसे कहूं दीवाली है

- अरविन्द योगी

आज की रात ये रौशन है
कल फिर सुबह काली है
झूठी होती इस दुनिया में
सच का दिया जो खाली है
कैसे कहूं दीवाली है !

टूटी अब हर रिश्तों की डाली है
रिश्ता भी अब एक गाली है
प्यार की बगिया जो खाली है
रोया हर एक माली है
कैसे कहूं दीवाली है !

तिनका तिनका बिखरा भारत अब
घुट घुट कर रोती भारत माता अब
देशप्रेम का उपवन अब ये खाली है
जिसकी भारत माँ ही माली है
कैसे कहूं दीवाली है !

भ्रष्टाचार की गहरी रात ये काली है
नेता करते देश की बिकवाली है
फैला हर ओर धोखा है दलाली है
बेचारी जनता, नेता अत्याचारी है
कैसे कहूं दीवाली है !

देश भक्ति का दिया जो खाली है
देश प्रेम की गर्म रक्त से
सुलग रहे हर देश भक्त से
नयी क्रांति आने वाली है
कैसे कहूं दीवाली है !

जलो तुम स्वरक्त से दिया भर
भारत माँ तुम्हे जगाने वाली हैं
भारत की जगमग ज्योति से
दुनिया हुयी उजाली है
दूर नहीं अब नव भारत की
कुछ ही दूर दीवाली है
पर कैसे कहूं दीवाली है !

यह कविता क्यों ? आतंकवाद , भ्रस्ताचार , बलात्कार , अत्याचार जाने कितने ही दिए जल रहे हैं भारत में अब और इनमे तेल बन कर जल रहा है भारत का हर आदमी !

हर ह्रदय दुखी है एक क्रांति चाहिए भारत को! नव भारत की दीवाली अभी दूर है उठिए जागिये और नव भारत की दीवाली लाने को क़मर कस लीजिये फिर मनाये हर रोज होली है दीवाली है !

Saturday, October 29, 2011

तुम कहाँ हो ?

- आशा पांडेय ओझा

तुम कहाँ हो ?
किरणों में रस घोलती तरंगो में
असंख्य तारों के विविध रंगों में
झुरमुट में अटके चाँद को निहारती
गीत भरे आंसू से प्रिय चरण पखारती
कहाँ ढूँढूं तुम कहाँ हो ?
 
हवा की लजीली खुनकियों में
किसी विरहनी की हिचकियों में
किसी बटोही की लोटती राह में
या उसकी राह ताकती निगाह में
ठहरी तुम कहाँ हो ?
 
कलेजे में इतनी ममता लेकर
इतनी संयुक्त क्षमता लेकर
कलियों सी कोमलता लेकर
अमृत घटों की मधुरता लेकर
रस सी घुलती तुम कहाँ हो?
 
पर कटे व्याकुल पांखी सी
झर-झर आंसू झरती आंखी सी
रात भर करवटों में जगी थकी रात सी
सूरज मिलन के प्रतीक्षा में बैठे प्रभात सी
छटपटाती तुम कहाँ हो ?
 
धुआं- धुआं सी क्यों उडती हो
मुझसे बिछड़ कर किससें जुड़ती हो
किस सीप का मोती बनने की चाह है तेरी
किन नयनों की ज्योति बनने की चाह है तेरी
वो कहाँ है और तुम कहाँ हो ?
 
किसको जितना चाहती हो खुद को हार के
किसके लिए पिरो रही फूल मनुहार के
खुद डूबना चाहती हो किसको तार के
किसके लिए सजे बोल अधरों पर प्यार के
बाट किसी की जोहती तुम कहाँ हो ?
 
किसके लिए है ये हिये की हलचल
किसके रूप पे हो गई इतनी पागल
ऐ-चातकी बता न कौन है तेरा बादल
कौन लायेगा तेरे लिए सतरंगी आँचल
ढूंढ़ती उसको तुम कहाँ हो?
 
मधुमय तेरे जीवन का कौन है मधु
ये बावली लहर बता कौन है तेरा सिन्धु
तुम किसकी हो यामिनी ,कौन है तुम्हारा इंदु
है किसके लिए बहकी नज़र अधर मृदु
समर्पित किसको तुम कहाँ हो ?
 
हिम की बाँह से बिछड़ी मंदाकिनी सी
साज के तारों से चटकी रागिनी सी
शशि की गोद से गिरती चाँदनी सी
माल्या से अलग हुई मलायीनी सी
तड़फती सी तुम कहाँ ?
 
जानती हो तेरा मन किसका है
जानती हो तेरा जीवन किसका है
भावों के सुमन संकलित हैं किसके वास्ते
श्रधा के कोमल सुमन मुकुलित हैं किसके वास्ते
न्यौछ्वर किसपे तुम कहाँ हो
 
किसें निरखती हो यूं निर्निमेष
किसको पाने को बदलती हो भेष
तेरे मरू जीवन का कुसुमित तरु है कौन
मन सरोवर की चारू तरंग है कौन
चाह में उसकी तुम कहाँ हो

पुस्तक “दो बूँद समुद्र के नाम” के “तुम कहाँ हो” के कुछ अंश

माया माया मन भरमाया

-राजीव जयस्वाल

माया माया
मन भरमाया
योग , ध्यान
कुछ काम ना आया
जब माया ने
तीर चलाया
माया माया
मन भरमाया |
 
मन को कभी
काम ने घेरा
राम नाम का
रस बिसराया
कोमल बदन
काजर नयन
प्रेम पाश फँस
मिथ्या प्रीत में
जन्म गँवाया
माया माया
मन भरमाया |
 
मन को कभी
रुपईया भाया
सुबह शाम
धन खूब कमाया
धर्म ना जाना
मर्म ना जाना
पैसा पैसा
पास में आया
अंत समय
जब चला बावरा
खाली हाथ
कुछ साथ ना जाया
माया माया
मन भरमाया |

आइनों ने नहीं सीखा..

- महिंदर रिश्म

किरण रौशनी की नज़र नहीं आती कहीं
सूरज हाथ में ले किधर चला गया है कोई
 
जख्म खुले हैं टीस भी बे-तरह सी उठती है
तीखे नश्तर फूलों में क्यों धर गया है कोई
 
सदायें लौटी हैं उस दर से बेआबरू हो कर
शायद परछाइयों ही से डर गया है कोई
 
मुहबत नहीं मोहताज मनसुई हवाओं की
इलज़ाम मौत का दूसरे पे धर गया है कोई
 
आइनों ने नहीं सीखा कुछ भी झूठ कहना
बीनाइओ में ही क्यों उतर गया है कोई

Monday, October 24, 2011

मैं कौन ?

- शरण कुमार लिंबाले
मूल मराठी से सूर्यनारायण रणसुभे द्वारा अनुवादित

यह तेजस्वी सूर्य किनके लिए ?
यह अनंत आकाश किनके लिए ?
यह विशाल जलाशय किनके लिए ?
यह विस्तृत देश किनके लिए ?
यह संसद, ये संविधान, ये लोग,
यह समाज, यह कानून किनके लिए ?
ये मनुष्य, मनुष्य लगते ही नहीं
खूंख़ार जानवरों के गिरोफ़ हैं ये,
मैं जी नहीं रहा हूँ रे यहां
सिर्फ़ मृत्यु को टाल रहा हूँ
क्षण-क्षण की मौत
पूरी ज़िन्दगी पर टँगी हुई ।
यह ज़िन्दगी भी क्या है ?
धधकती झोपड़ी में
जलते हुए जीने के लिए
मज़बूरी से की गई कोशिश !
मैं कौन ? मैं किनके लिए ?
गूँगी सत्ता, गूँगी जनता, गूँगी संस्कृति
गूँगे वेद, गूँगे शास्त्र, गूँगी मनुस्मृति ।

Sunday, October 23, 2011

हर बंदा , रावण औ राम

- राजीव जयस्वाल

हर बंदे में
प्रेम भावना
हर बंदे में
प्रणय कामना
हर बंदे में
प्रभु बंदगी
हर बंदे में
है दरिंदगी |

हर बंदे में
एक कविता
हर बंदे में
एक रचियता
हर बंदे में
एक देवता
हर बंदे में
छिपा प्रेत सा |

हर बंदे में
छोटा सा बच्चा
हर बंदे में
आदम एक सच्चा
हर बंदे में
आकुल मन एक
हर बंदे में
रोगी तन एक |

हर बंदा
है गुण की ख़ान
हर बंदा
बोधिसत्व महान
हर बंदा
देवत्व स्वरूप
हर बंदा
कृतित्व अनूप |

हर बंदा
कोशिका का जाल
हर बंदा
परमाणु ख़ान
हर बंदा
एक जटिल शरीर
हर बंदा
है संत कबीर |

हर बंदा
पावन ज्यों गंग
हर बंदा
नीचा औ नंग
हर बंदा
रावण औ राम
हर बंदा
कन्स औ श्याम
हर बंदा
निपट बकवास
हर बंदा
है प्रभु निवास |

Sunday, October 16, 2011

तुम ही मेरी

- राजीव जयसवाल

तुम ही मेरी
सुरा और साकी
तुम ही मेरी
मदिरा  प्याला
तुम मेरी
मधु मधुशाला
तुम ही
मय की  हाला हो |

तुम ही मेरी
प्रणय देविका
तुम  ही मेरी
प्रीत चंद्रिका
तुम ही मेरी
नयन ज्योतिका |
तुम ही
ज्योति उजाला हो |

तुम ही मेरी
प्रेम प्रेरणा
तुम ही मेरी
प्रणय कामना
तुम ही मेरी
भाव भावना
तुम ही
काम की ज्वाला हो|

Saturday, October 15, 2011

मेरे घर के रास्ते

-डा. कृष्णा जनास्वामी
मेरे घर के रास्ते
उन पगडंडियों के बने
जिन्हें समय ने बनाये
पर
आज अस्पष्ट लग रहे |

फिर भी आज
उन पर होकर मेरे विचार
जब पहुंचते हैं
स्वर
मचान बन जाता है घर |
कागज़ और कलम उठती
विचारों पर और लोटती
फर्श कडकडाते सूखे
पत्ते
प्रतीक्षारत पसरे धूल की तरह |
ये न व्यवस्था है न मजबूरी
समय का ये तड़का शीशा
जिसके अनुभवों के विकृत
किरणों में
अनेक कणों का पाता हूँ पलायन |
क्रओंधाती इस चमक से
समा जाती बंद आँखों में
कहानियां सारे
टुकड़ों की
निह्स्तब्ध, आरक्षित व् स्वभावगत |

Thursday, October 13, 2011

साज को सुरों से जुदा किया

-अरविन्द योगी

वक़्त ने फिर ऐसा दगा दिया
साज को सुरों से जुदा किया
हर आँखों को सावन सा रुला दिया
यादों को जिसने दिशा दिया
वक़्त ने उसको अब मिटा दिया
जग को जिसने जीत दी
जीवन उसे ही रुला दिया !
वक़्त तू भी उसे भुला ना पायेगा
तेरे हर युग में वो छा जायेगा
जग जितना जगजीत को भुलायेगा
वो उतना ही याद आएगा
भला कौन है जो तुझे भूल पायेगा
जगजीत तू बहुत याद आएगा !
वक़्त जब भी दिल को जलाएगा
तेरा आवाज धड़कन बन जायेगा
जीत ने रिश्ता तोड़ लिया
सरगम ने साज को छोड़  दिया
तेरा मखमली खामोश मुस्कराहट
तेरा हर धड़कन हर आहट
रग रग में समां गया है
साज को सुरों से जुदा किया
ओ गजल का प्यारा बाजीगर
आवाज का खामोश जादूगर
तू जितना दूर उतना पास है
तू हर गजल  की साज है
वक़्त ने जब भी दगा दिया
तेरी आवाज ने जगा दिया
जग रोये अब  तू मुस्कराए
जगजीत तुम बहुत याद आये
वक़्त तूने क्या किया
सज को सुरों से जुदा किया !

यह कविता क्यों ? मखमली आवाज का जादूगर अब फिर खामोश है अबकी ख़ामोशी गहरी है जाने वो कहाँ गया जो हर दिल में धड़कन सा समां गया !वो वापस आएगा जिस वक़्त ने हमसे जगजीत जी को छीना है वही वक़्त उन्हें फिर हमारे बीच लायेगा अबकी जब सावन आएगा दुसरे रूप में जगजीत इस दुनिया में फिर आएगा !

Tuesday, October 11, 2011

गुस्सा गधे को आ गया

-पंडित सुरेश नीरव

कौन है जो फस्ल सारी इस चमन की खा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया
प्यार कहते हैं किसे है कौन से जादू का नाम
आंख करती है इशारे दिल का हो जाता है काम
बारहवें बच्चे से अपनी तेरहवीं करवा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया

वो सुखी हैं सेंकते जो रोटियों को लाश पर
अब तो हैं जंगल के सारे जानवर उपवास पर
क्योंकि एक मंत्री यहां पशुओं का चारा खा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया

जबसे बस्ती में हमारे एक थाना है खुला
घूमता हर जेबकतरा दूध का होकर धुला
चोर थानेदार को आईना दिखला गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया

गुस्ल करवाने को कांधे पर लिए जाते हैं लोग
ऐसे बूढ़े शेख को भी पांचवी शादी का योग
जाते-जाते एक अंधा मौलवी बतला गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया

कह उठा खरगोश से कछुआ कि थोड़ा तेज़ भाग
जिन्न आरक्षण का टपका जिस घड़ी लेकर चिराग
शील्ड कछुए को मिली खरगोश चक्कर खा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया

चांद पूनम का मुझे कल घर के पिछवाड़े मिला
मन के गुलदस्ते में मेरे फूल गूलर का खिला
ख्वाब टूटा जिस घड़ी दिन में अंधेरा छा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया

कौन है जो फस्ल सारी इस चमन की खा गया
बात उल्लू ने कही गुस्सा गधे को आ गया।